' बे खबर '
मैं बे खबर हूँ तेरे हौसलों से, तू खेल रहा मेरे उसूलों से,
मत कर ऐसी दगाई मेरे राही, हाल मैंने नहीं दिल ने जाना है।
मैं बे खबर हूँ तेरे हौसलों से,
तू खेल रहा मेरे उसूलों से...!
तुझे दिया फूल बे असर हो रहा,
पहाड़ों पर लिखे नाम तू भूल रहा,
इतना भी तूने क्या जायज कर दिया,
मेरा दिल भी हमेशा बे कसूर रहा |
मैं बे खबर हूँ तेरे हौसलों से,
तू खेल रहा मेरे उसूलों से....!
जगमगा रही जिंदगी को बुझाने लगा हैं,
भीग रहे ख़्वाबों को तू सुखाने लगा है,
मेरे रह गुज़र को मिटा रहा हैं तू,
पर अब मैं खबरदार हूँ तेरे वसूलों से |
मैं बे खबर हूँ तेरे हौसलों से,
तू खेल रहा मेरे उसूलों से...!
दिल पर दगाबाजी की मुहर लगा रहा,
जिंदगी की कुछ यादें वो पहर गंवा रहा,
मेरे चंद महताबों में शुमार रखूँगा,
मेरी अकेली राह में एक तू कारवां रहा |
मैं बे खबर हूँ तेरे हौसलों से,
तू खेल रहा मेरे उसूलों से....
मत कर ऐसी दगाई मेरे हमराही,
हाल मैंने नहीं दिल ने जाना है।
🖋 खेतदान चारण ' स्नेहीमन '