तरु की छाँव
खेलता बचपन
अपना गाँव
मिट्टी चंदन
निखरित मस्तिष्क
कोटि वंदन
बहे सरिता
है धरा पल्लवित
मग पुनिता
कुँजती पिक
लगे मनभावन
देती सीख
कृषक झुमे
लहलहाते धान
माथा चुमे
पुष्प पलाश
देती नव चैतन्य
पूरी तलाश
तोषण कुमार चुरेन्द्र
राम जपय शिवनाम को,शंकर हा श्री राम। राम नाम सब मन जपव,बनही बिगड़े काम। बनही बिगड़े काम,राम शिव संगी मितवा। करथे बेड़ा पार,बने जी सब...
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