कइसे मनावंव जी होली
मोर छत्तीसगढ के बस्तर म,
दिन रात चलत हे गोली..
तिही बताना संगवारी मोर ,
कइसे मनावंव जी होली..
डर डर जिंहा जिनगी जियतहे,
हमर सगा सोदर मन.
काबर हमर सरकार नंइ देखे,
दुख पीरा भरे ओखर मन.
लगत हे जेकर माथा म,
छिन छिन लहु के रोली..
तिही बताना संगवारी मोर,
कइसे मनावंव जी होली...
ढर ढर आँखी ले आँसू निकले,
मोर छत्तीसगढ महतारी के,
जेकर लइका प्रान ल त्यागे,
अब मोह का रंग पिचकारी के
कहां ले पाही अपन अंगना म,
फेरले हंसी ठिठोली
तिही बताना संगवारी मोर,
कइसे मनावंव जी होली...
फूलबगिया ल उजडत देख,
करेजा चानी होवत हे
बेटा के आस ल देख के ,
घर घर महतारी रोवत हे
नक्सलवाद ल खतम करव,
सुनव "तोषण" के बोली
तिही बताना संगवारी मोर,
कइसे मनावंव जी होली.....
रचनाकार
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडी लोहारा
बालोद छ.ग.
९६१७५८९६६७
रचना दिनाँक १२/०३/१७