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मंगलवार, 9 जून 2020

तोर मया मोर जीव के

विषम मात्रिक गजल
बहर /मात्रा /मापनी
२११ २२१ २१२ २१२ २

तोर मया मोर जीव के काल होगे।
देख देख फेर समय जंजाल होगे।

सोच रहिस दुनो मया कुरिया बसाबो,
कोन जनी कते तीर में चाल होगे।

रुसा झनी कभू मोर ले रूप रानी,
फूल सही देह कोयली ढाल होगे।

बात मान मोर संग मा जिबो मरबो,
जरे भले जमाना ह अड़ियाल होगे।

तोषण चुरेन्द्र दिनकर

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

दीदार करया हूँ

चोरी छिपे सही दीदार करता हूँ।
जानें नहीं कभी मैं प्यार करता हूँ।

देखे कभी नमी आँखें झलक से जो,
अपनी झुकी निगाहें चार करता हूँ।

तेरे हँसी लबों की चाहत मुझे है,
खुद को कभी-कभी बीमार करता हूँ।

माना मुझे नही आता मुस्कुराना,
तेरे लिए जहाँ गुलजार करता हूँ।

समझो नहीं कभी गूँगा बधिर हमको,
इश़्की जुबाँ अभी इजहार करता हूँ।

तोषण कुमार चुरेन्द्र
"धनगंइहा"

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

मोर आँखी के पुतरी

*समीक्षा बर आप सब के बीच प्रस्तुत*

*"मोर आँखी के पुतरी"*

*मोर आँखी के पुतरी कस चमकत रहिबे,*

*बनके फूल मन बगिया म महकत रहिबे!*

*झिन सिरावय मया तोर मोर बर संगी,*

*चिरइ कस हिरदे अंगना म चहकत रहिबे!*

*सावन के महिना बरसा बरोबर गुंइया,*

*बन ठन मया के बरखा बरसत रहिबे!*

*छावय झन दुख के बदरा तोर होंठ म,*

*फूल जस मंउहा खुल खुल हँसत रहिबे!*

*सरदी गरमी रीतु बरसात रहय चाहे,*

*सदा सुहागिन फूल जस सँवरत रहिबे!*

*भुल नइ पाहू तोला कभू मँय तोषण ह,*

*बइठ मया के रस्ता मोला अगोरत रहिबे.*

तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगाँव डौंडी लोहारा
  बालोद ( छ. ग.)

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