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बुधवार, 5 मई 2021

बेटी की बेटी हूँ

एक बेटी का एक माँ के लिए अल्फाज
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कहते हैं लोग तेरी परछाई हूँ मैं।
मेरी माँ तू पहले फिर आई हूँ मैं।
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तन का लहू तेरे मुझमें बह रही,
हाथों से  सेकी  रोटी खाई हूँ मैं।
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चलना सिखाया अंगुली पकड़े,
लगादो  मरहम  चोट लाई हूँ मैं।
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ढाल  बनकर  साथ रही हमेशा,
जब  खुद  को  तन्हा पाई हूँ मैं।
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सीना गर्व से  फूल जाता है माँ,
लगता है स्वयं लक्ष्मी बाई हूँ मैं।
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महिषा रक्तबीज हजारों यहां है,
संघारिणी दुर्गा काली माई हूँ मैं।
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बेटी की बेटी हूँ जहान में आके,
हर घर की खुशी पहुनाई हूँ मैं।
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देखो थके नही अब ये "तोषण"
कलम की उसकी रानाई हूँ मैं।
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तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडी लोहारा
बालोद छ.ग.

शनिवार, 13 मार्च 2021

लोग

★ *लोग* ★
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दीपक बनके न सही जलते हैं लोग।
आस्तीं के सांप जैसे डसते हैं लोग।
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मुस्कान अधरों पर रखकर यूँ झूठी,
बेदर्द जहाँ में अपने छलते हैं लोग।
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देख-देख हँसती खिलती दुनिया मेरी,
फाँसने को मुझे जाल बुनते हैं लोग।
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रहता हूँ घिरा जमाने के रंजो गम से,
राहों पे सदा काँटे बनकर रहते है लोग।
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एक था एक ही रहेगा जहाँ में "तोषण,"
मिलकर मेरे ही गाँव में कहते हैं लोग
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तोषण चुरेन्द्र धनगाँव
डौंडी लोहारा बालोद
छ.ग.

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

इंसान बनादे..(मुक्त गजल तोषण दिनकर)

सुन मेरे भगवान सुन मेरी पहचान बनादे।
आदमी हूँ आदमी मुझे बस इंसान बनादे।

नफरत न हो किसी से जब तक है जिंदगी ,
जान बीते खातिरदारी में मेजबान बनादे।

सहारा बेसहारों का भूखे का निवाला बनूँ,
बढ़ाता चलूँ सबकी कद कदरदान बनादे।

रखूँ समेट कर ये सारे गुलशन जहाँ का,
मुस्कुराते गुलों का मियाँ बागबान बनादे।

फक्र करे तुझ पर दिनकर ए आसमान,
खुशियों से भरा एक हिन्दुस्तान बनादे।

तोषण कुमार चुरेन्द्र " दिनकर"

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

बाकी है...

*बाकी है...*

मुश्किलों के दौर में एक आस बाकी है।
दूर तुम भी दूर हम भी एहसास बाकी है।

सम्हाले रख्खा है अब तलक ये दिल को,
आने को अभी नया मधुमास बाकी है।

जल्द मिटेंगे गिले शिकवे बुरे वक्त सारे,
दिन नव किरण का पल खास बाकी है।

सुनी पड़ी मधुबन ओ कान्हा रसिया की,
सुर्ख हुए वृंदावन की महारास बाकी है।

चाहत "दिनकर" को मिलने की तुझसे,
करने को बस रब से अरदास बाकी है।

-तोषण कुमार "दिनकर"

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

बड़े दिनों बाद

बड़े दिनों बाद...

समीक्षा हेतू

बड़े दिनों बाद एक बात दिल में आई है।
अपनों के भीड़ में भी कितनी तन्हाई है।

गुजारा हुआ हर पल आज कहता है मुझसे,
अब तेरी वफा में न जाने ये कैसी रूसवाई है।

बहती ये हवाएँ भी सदाएँ देती है हमको,
पहले की वफा हँस कर फिर क्यूँ बेवफाई है।

लौटकर न आना कभी जा अब दूर कहीं,
मेरे दिल की गली से सब दिन की बिदाई है।

ये फिजायें ये गुलशन भी बातें नहीं करते,
कहते ही रहते हमें ये "धनगंइहा" हरजाई है।

तोषण कुमार चुरेन्द्र धनगंइहा
उपाध्यक्ष, मधुर साहित्य परिषद
ईकाई डौंडी लोहारा

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

सीख

सीख

मीत  बनाना  सीख ले।
पेड़   लगाना  सीख ले।

सुख दुःख के साथी ये,
रीत  निभाना  सीख ले।

झुक जाते सब के लिए,
माथ  नवाना  सीख ले।

देते सबको वन औषधि,
दवाई  बनाना सीख ले।

काटने वाले निर्मम हो,
चेत  लगाना  सीख ले।

मिले जिनसे शुद्ध हवा,
गुल महकाना सीख ले।

हो सावन शाम सुहानी,
मेघा  बुलाना सीख ले।

सारा आलम  हरा भरा,
राह दिखाना सीख ले।

परिंदों के मत शत्रु बन,
घरोंदा बनाना सीख ले।

कहे सबसे तोषन प्यारे,
जग  बचाना  सीख ले।

तोषन धनगंइहा
धनगाँव डौ.लोहारा
बालोद

गुरुवार, 30 मई 2019

जवाब नंइहे

ये मोर संगवारी तोर जवाब नंइ हे।
रहिबो संग मिलके कोन्हों खाब नंइहे।

दिही मिसाल सब हमर मितानी के,
कखरो हमर जइसे रूआब नंइहे।

जिथन हमन एक दुसर ल देख के,
राखय कोन जेकर हिसाब नंइहे।

पढ़ही ज़माना अब दुनों के कहानी,
हमर मितानी कस किताब नंइहे।

रहिथन संग दुनों सुख अउ दुख म,
टोर दिही संग कोन्हों शबाब नंइहे।

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