एक बेटी का एक माँ के लिए अल्फाज
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कहते हैं लोग तेरी परछाई हूँ मैं।
मेरी माँ तू पहले फिर आई हूँ मैं।
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तन का लहू तेरे मुझमें बह रही,
हाथों से सेकी रोटी खाई हूँ मैं।
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चलना सिखाया अंगुली पकड़े,
लगादो मरहम चोट लाई हूँ मैं।
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ढाल बनकर साथ रही हमेशा,
जब खुद को तन्हा पाई हूँ मैं।
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सीना गर्व से फूल जाता है माँ,
लगता है स्वयं लक्ष्मी बाई हूँ मैं।
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महिषा रक्तबीज हजारों यहां है,
संघारिणी दुर्गा काली माई हूँ मैं।
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बेटी की बेटी हूँ जहान में आके,
हर घर की खुशी पहुनाई हूँ मैं।
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देखो थके नही अब ये "तोषण"
कलम की उसकी रानाई हूँ मैं।
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तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगांव डौंडी लोहारा
बालोद छ.ग.
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