चोरी छिपे सही दीदार करता हूँ।
जानें नहीं कभी मैं प्यार करता हूँ।
देखे कभी नमी आँखें झलक से जो,
अपनी झुकी निगाहें चार करता हूँ।
तेरे हँसी लबों की चाहत मुझे है,
खुद को कभी-कभी बीमार करता हूँ।
माना मुझे नही आता मुस्कुराना,
तेरे लिए जहाँ गुलजार करता हूँ।
समझो नहीं कभी गूँगा बधिर हमको,
इश़्की जुबाँ अभी इजहार करता हूँ।
तोषण कुमार चुरेन्द्र
"धनगंइहा"
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