समीक्षार्थ
पढ़ा लिखा ज्यादा नही,जरा नहीं है ज्ञान।
कोशिश करता सीखना,गावै जो वेद पुरान।।
गावै जो वेद पुरान,धरूँ हृदय में ध्यान से।
मिले अलग पहचान,सधे सभी गुणवान से।।
रहे सदा जो नेह,मुझ पर दीना नाथ की।
बरसे निशदिन मेह,कृपा सभी के साथ की।
तोषण बोले बात,कटुक वचन भी ना कहीं।
मंद बुद्धि है जान,पढ़ा लिखा ज्यादा नहीं।
तोषण कुमार चुरेन्द्र
"धनगंइहा"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें