शनिवार, 25 जून 2016

॥ मां ॥

यह रचना मेरी दिवंगत
माताजी को सादर समर्पित
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॥ मां ॥
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मां तू चली गई कहाँ
छोड़कर बियाबाँ जग मग में।
चल पाऊंगा कैसे मां
कांटों भरे अंधेरे पग पग में।

जो तू थी साथ मेरे
मुझको कोई गम न था।
जाने से तेरे पहले कभी
आंखें कभी नम न था।
याद तुझे करके रोता
बहते लहू मेरी रग रग में।
चल पाऊंगा कैसे मां
कांटों भरे अंधेरे पग पग में।।
भुखी रहकर हमें खिलाई
सुलाती हमें खुद जगती थी।
हम जो हंसते तू हंस लेती
जख्मों पर मरहम भरती थी।
छिपाने धूप से हमको मां
छांव बन चली मग मग में
चल पाऊंगा कैसे मां
कांटों भरे अंधेरे पग पग में।।
बाधाएं कितनी भी आई
बनी ढाल तू खड़ी रही।
रक्षा करने हमारी खातिर
बन तलवार तू अड़ी रही।
गाथा तेरी अमर है मां
याद रहेगी हर युग युग में।
चल पाऊंगा कैसे मां
कांटों भरे अंधेरे पग पग में।।
जाने से तेरे थम सा गया
बचपन मेरा हंसता पूरा।
मां जो रहती पास मेरे
रहता न जीवन मेरा अधूरा
रहेगा आशीष साथ मां का
हीरा सा चमकूंगा नग नग में।
चल पाऊंगा कैसे मां
कांटों भरे अंधेरे पग पग में।।
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I Miss you "MATAJI"
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मां का लाडला-आचार्य तोषण
लाडले का गांव-धनगांव
डौंडीलोहारा, बालोद
९६१७५८९६६७

बेरहम मिला मुझको।।

 
नाम न लेना मुहब्बत का गम ही गम मिला मुझको।
जखम दे गई गहरी ऐसी ना मरहम मिला मुझको।।
भूलकर भी न चाहूंगा किसी को जिंदगी में अब
रहम दिल समझा जिसको बेरहम मिला मुझको।।
-आचार्य तोषण

चुर चुर हंव।

महूं ह कतेक मजबूर हंव।
मितवा तोरले गजब दूर हंव।
बिछड के जहुरिया तोर ले
फुटहा दरपन सही चुर चुर हंव।
आचार्य तोषण

प्रेम धार

प्रेम धार बहती अजब प्रेमी प्रेमिका मिलती गजब।
प्रेम ना देखे जात पात देखे नही कोई मजहब।
आचार्य तोषण

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