*ठेलहा राम*
*किहिस एक दिन मोला कोई,*
*का तोर बर कहुं नइये काम।*
*खाथस पीथस घूमत रहिथस,*
*बने बात नोहे जी ठेलहा राम।*
*केहेंव महु घलो गोठ बने जी,*
*मोरो करा हे अब्बड़ काम।*
*काम करहु फेर रहा ले ले गा,*
*करन देना थोरिकन अराम।*
*काम बुता बर संसो नइये,*
*हस कोढिहा तै कथे सियान।*
*पाछु झन पसताये ल परय,*
*काम बुता बर दिहा धियान।*
*सियान के गोठ मान लेहेंव,*
*अब जाथँव महुँ कमाय बर।*
*खुद भविस के संसो करके,*
*सुग्घर जिनगी सिघयाय बर।*
*तोषण कुमार चुरेन्द्र*
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें