दोहा-
बनकर साधु मैं खड़ा,दर पे तेरे आज।
हाथ जोड़ कर कामना,रख लो मेरी लाज।।
चौपाई:-
तेरे चरण मैं माथ नँवाऊँ।
होत भोर तेरे गुन गाऊँ।
कृपा तेरी मिले प्रभू मोहे।
करतल बान धनुष अति सोहे।
आए शरण नीज दीन दुखारी।
रहिहव सदा तुम मीत हमारी।
बार-बार बर माँगँव तोसे।
पाप कभी नहीं होय मोसे।
सबके घर भंडार भरौ तुम।
गलत राह में न हो कोई गुम।
सबके रहना सदा सहाई।
दाता करता यही दुहाई।
दोहा:-
रहे सदा सद्भावना,माँगू यह वरदान।
सेवक बनकर सब रहे,मिले मान सम्मान।।
तोषण कुमार चुरेन्द्र "धनगंइहा"
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