रविवार, 19 अप्रैल 2020

घनाक्षरी विधान

नमस्कार
आज एक सुंदर गेय छन्द के बारे में जानते हैं ।
*छन्द : मनहरण घनाक्षरी*
*लक्षण*
मनहरण घनाक्षरी छन्द एक वार्णिक वृत्त है, जिसमें *कुल 4 पद* होते हैं तथा प्रत्येक पद में *4 चरण* होते हैं तथा 16 - 15 वर्णों पर यति, चारों पद समतुकांत, तथा अंत गुरु होने का प्रावधान है ।
इसे अन्य रूप में 8, 8, 8, 7 वर्णों पर क्रमशः यति के स्वरूप में पढ़ा एवं रचा जाता है ।

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*विशेष - घनाक्षरी, दो शब्दों 'घन' और 'अक्षरी' से बना है । यहाँ 'घन' शब्द के अनेक अर्थ हैं -
*पहला अर्थ -* सघन : अर्थात् इस छन्द में शब्दों का सघन बुनाव ही इसकी गेयता को श्रेष्ठ बनाता है । चूँकि यह वार्णिक छन्द है, इस हेतु 'लघु' अथवा 'गुरु' मात्रा पर पृथक् भार दिया जाना आवश्यक नहीं, दोनों मात्राओं पर समान ही बल दिया जाना चाहिए ।
*दूसरा अर्थ -* मेघ : अर्थात् गेयता में मेघ की गर्जना के समान ध्वनि उत्पन्न हो । इसका अत्यधिक प्रयोग वीर रस की रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है ।
*तीसरा अर्थ -* बड़ा हथौड़ा : अर्थात् रचना की गेयता और प्रवाह  इस प्रकार हो जैसे कि रचनाकार अपनी रचना से हथौड़े से प्रहार करने के बराबर प्रभाव उत्पन्न कर रहा हो ।
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आइए एक उदाहरण द्वारा इसके वर्ण विधान को समझने का प्रयास करते हैं ।

*विषय - गाँव*
*छन्द - मनहरण घनाक्षरी*

माटी वाले घर रहें, पद्म सरोवर रहें,
कोयल की कुहू-कुहू, कौआ काँव-काँव जी ।
वट लता झूल-झूल, बाग सजें फूल-फूल,
शांति भरी अनुभूति, पीपल की छाँव जी ।
आधुनिक बन भले, गाँव नगरों को चले,
धरोहर मुनियों की, लगी काहे दाँव जी ।
सोंधी गंध माटी रहे, वन नदी घाटी रहे,
सपना यही है मेरा, गाँव रहे गाँव जी ।।


*1. पद विधान*

कुल पदों की संख्या - 4 पद
प्रत्येक पद में चरणों की संख्या - 4 चरण
*1 चरण , 2 चरण*
*3 चरण , 4 चरण*


*2. वर्णक्रम/वर्ण विधान*

*प्रथम पद*
1 चरण (8 वर्ण), 2 चरण (8 वर्ण)
3 चरण (8 वर्ण), 4 चरण (7 वर्ण)

माटी वाले घर रहें (8 वर्ण)
I  I    I  I  I I  I I 

पद्म सरोवर रहें, (8 वर्ण)
I  I  I  I  I I I I

कोयल की कुहू-कुहू, (8 वर्ण)
I   I  I   I   I   I  I  I

कौआ काँव-काँव जी (7 वर्ण)
 I    I    I  I  I   I  I

इसी प्रकार
*द्वितीय पद*
1 चरण (8 वर्ण), 2 चरण (8 वर्ण)
3 चरण (8 वर्ण), 4 चरण (7 वर्ण)

वट लता झूल-झूल (8वर्ण), बाग सजें फूल-फूल, (8वर्ण)

शांति भरी अनुभूति(8वर्ण), पीपल की छाँव जी (7वर्ण) ।

इसी प्रकार
*तृतीय पद*
1 चरण (8 वर्ण), 2 चरण (8 वर्ण)
3 चरण (8 वर्ण), 4 चरण (7 वर्ण)

आधुनिक बन भले (8वर्ण), गाँव नगरों को चले (8वर्ण),
धरोहर मुनियों की (8वर्ण),  लगी काहे दाँव जी (7वर्ण)

इसी प्रकार
*चतुर्थ पद*
1 चरण (8 वर्ण), 2 चरण (8 वर्ण)
3 चरण (8 वर्ण), 4 चरण (7 वर्ण)

सोंधी गंध माटी रहे (8वर्ण), वन नदी घाटी रहे (8वर्ण),
सपना यही है मेरा (8वर्ण), गाँव रहे गाँव जी (7वर्ण) ।।

*3. कुल वर्ण विचार*
प्रत्येक *पद* में 

(प्रथम + द्वितीय) चरण = 8 + 8 = 16 वर्ण
(तृतीय + चतुर्थ) चरण = 8 + 7 = 15 वर्ण

*4. मात्रा विचार*

प्रत्येक पद के अंतिम चरण में *गुरु* का विधान अर्थात् गुरु मात्रा वाले वर्ण का स्थान होना ।
*(विशेष - प्रवाह की सुगमता हेतु इसे क्रमशः "लघु - गुरु" के क्रम में रखा जाता है )*
अवलोकन करें - 

काँव जी ■ छाँव जी ■ दाँव जी ■ गाँव जी
S  I   S      S  I   S    S  I  S         S  I   S

*5. समतुकांत*
चारों पदों में समतुकांत का होना अनिवार्य

काँव जी ।
छाँव जी ।।
दाँव जी ।
गाँव जी ।।

*6. अन्य ध्यातव्य बिंदु*

 # प्रवाह की उत्कृष्टता एवं नाद सौंदर्य को बढ़ाने के लिए, प्रथम एवं द्वितीय तथा तृतीय चरणों में भी सम तुकान्त /अन्त्यानुप्रास रखे जा सकते हैं ।
 # संयुक्त शब्दों का कम प्रयोग ।
 # जोड़ी वाले शब्दों का प्रयोग, यथा
   2 वर्णों वाली जोड़ी (2, 2, 2, 2)
     (माटी वाले घर रहें)
   2 एवं 4 वर्णों वाली जोड़ी (2, 2, 4) (2, 4, 2) (4, 2, 2)
      आधुनिक बन भले (4, 2, 2)
      शांति भरी अनुभूति (2, 2, 4)
       पद्म सरोवर रहें (2, 4, 2)
 # इसके अतिरिक्त विषम पदों के प्रयोग में ध्यातव्य - 
    सभी सम पद ( (2, 2, 4) (2, 4, 2) (4, 2, 2) (2, 2, 2, 2) (4, 4) ) - उत्तम

    विषम-विषम-सम पद (3, 3, 2) - उत्तम
    सम-विषम-विषम पद (2, 3, 3) - पचनीय
    विषम-सम-विषम पद (3, 2, 3) - वर्जित


गुरुओं द्वारा अर्जित ज्ञान एवं अल्प अनुभव के अनुसार मनहरण घनाक्षरी छन्द विधान को एक उदाहरण द्वारा समझाने का प्रयत्न किया गया । उम्मीद है यह ज्ञान आपको किसी नए छन्द के विधान के साथ, उसकी रचना को प्रेरित करे ।

साखी गोपाल पण्डा
बरमकेला, रायगढ़
7828163183

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