मेरी आँखों मे, उतर आई है।
अब तन्हाई।
दूर तुमसे क्या हुई, ये जहां रास न आई।
कल तलक बाहों का सहारा था बहुत,
आज डराने लगी खुद मेरी परछाई।
तेरी चाहत की हमकों बस तमन्ना थी,
ये न सोचा था कि है कितनी गहराई।
अब भी सुनी हैं हाथें मेहंदी बिन,
कब कानों में गूँजेगी मेरी शहनाई।
प्यार तुझसे नही एकबार कह दिया होता,
न जिल्लतें होती न रुषवाई।
शशि तिवारी, महुवा, दुर्ग cg।
7805806358
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