मंगलवार, 27 मार्च 2018

मेरी आँखें

मेरी आँखों मे, उतर आई है।                                
अब तन्हाई।

दूर तुमसे क्या हुई, ये जहां रास न आई।

कल तलक बाहों का सहारा था बहुत,
आज डराने लगी खुद मेरी परछाई।

तेरी चाहत की हमकों बस तमन्ना थी,
ये न सोचा था कि है कितनी गहराई।

अब भी सुनी हैं हाथें मेहंदी बिन,
कब कानों में गूँजेगी मेरी शहनाई।

प्यार तुझसे नही एकबार कह दिया होता,
न जिल्लतें होती न रुषवाई।

शशि तिवारी, महुवा, दुर्ग cg।

7805806358

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