॥दारू॥
का अंग्रेजी का देशी कहिले,रंग-रंग के हे दारू।
इही दारू चक्कर म,मरगे कतको मंगलू समारू।
का अंग्रेजी का देशी कहिले,रंग-रंग के हे दारू।
इही दारू चक्कर म,मरगे कतको मंगलू समारू।
दारू के मारे कहीं नी बांचे, थारी बटकी बेंचात हे।
दाई ददा सुवारी लइका ल,खूंन के आंसू रोवात हे।
पीए रथे दारू लटलटले,कुकूर माकुर कस सोथे।
होत बिहनिया उतारा बर,देशी दारू म मुंहू धोथे।
छठ्ठी बरही सब्बे जिनिस मा,दारू होगे हे फैशन।
बिन दारू काम नी होवय, जमाना आगे कइसन।
बर बिहाव के दिन म गाड़ी,दारू पी-पी के चलात हे।
खोधरा डिपरा देखय नीही,पेंड़ म जाके झपात हे।
एक पाव दारू पिए म,कोन जनी का मंजा आथे ।
अमरीत असन खून म,पचीस ग्राम जहर मिलाथे।
नशा म कखरो बनय नही, कहिथे नाश के जड़ ।
नशा देव तुम छोड संगी,सुघ्घर नवा जिनगी गढ़।
आचार्य तोषण
दाई ददा सुवारी लइका ल,खूंन के आंसू रोवात हे।
पीए रथे दारू लटलटले,कुकूर माकुर कस सोथे।
होत बिहनिया उतारा बर,देशी दारू म मुंहू धोथे।
छठ्ठी बरही सब्बे जिनिस मा,दारू होगे हे फैशन।
बिन दारू काम नी होवय, जमाना आगे कइसन।
बर बिहाव के दिन म गाड़ी,दारू पी-पी के चलात हे।
खोधरा डिपरा देखय नीही,पेंड़ म जाके झपात हे।
एक पाव दारू पिए म,कोन जनी का मंजा आथे ।
अमरीत असन खून म,पचीस ग्राम जहर मिलाथे।
नशा म कखरो बनय नही, कहिथे नाश के जड़ ।
नशा देव तुम छोड संगी,सुघ्घर नवा जिनगी गढ़।
आचार्य तोषण

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