गुरुवार, 7 जुलाई 2016

सुसंस्कार/सुसंस्कृति

सुसंस्कार/सुसंस्कृति
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कभू फूल त कभू कांटा
झोरा म लेल परही।
मझधार म फंसे डोंगा ल
पतवार म खे ल परही।।
देश,आघू बढाना हे त
अवइयय्या पीढ़ही ल
सुसंस्कार दे ल परही।।
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बदलगेहे परिवेश देश के
बदलत हे नैतिक अधार।
खवइ-पियइ घलो बदलगे
बदलगेहे अचार बिचार।।
सत अहिंसा क्षमा दया
रिहिस संस्कृति मूलाधार
आज के चकाचउंध में
बनगेहे जइसे निराधार।।
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भरत भुंइया म जनम धरिन
राम लछमन बीर हनुमान हे
पबरित भुंइया के भाग जगाके
बढाइस निरंतर एखर मान हे।
प्रहलाद हमर संस्कृति के शान हे
सुसंस्कारिता जिनगी के परान हे
सुसंस्कृत लइका भविस देश के
संस्कृति पुरखउती के मुसकान हे।।
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-आचार्य तोषण

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